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सागर से कृष्णकांत नगाइच की रिपोर्ट एमपीसीजी न्यूज़29
सागर जिले के जलंधर गांव में विंध्य पर्वत पर विराजित है देवी की अद्वितीय विलक्षण प्रतिमा
शक्ति की आराधना का पर्व नवरात्रि प्रारंभ हो गया है
पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार शक्ति के नों रूप बताये गए है जिनके इक्यावन शक्तिपीठ भारत सहित नेपाल पाकिस्तान बांग्लादेश में स्थापित है लेकिन देवभूमि भारत वर्ष में अनेकानेक रहस्मय तथा गुप्त प्राचीन शक्ति पीठ हैं
ऐसे ही एक स्थल के दर्शन हम आपको करवा रहे है --
सागर से खुरई राष्ट्रीय राजमार्ग के जरुआखेड़ा कस्बे से महज 10किलोमीटर दूर जलंधर गांव में जंगलों के बीच विंध्याचल पर्वत माला की गोदी मैं विराजी है देवी की एक विलक्षण प्रतिमा जिसे स्थानीय लोग ज्वाला माई कहते है--पुराणों में तथा दुर्गासप्तसती में माता के विभिन्न स्वरूपो का वर्णन है और इन्ही के अनुसार प्राचीन काल से माता की विभिन्न स्वरूपों तथा लीलाओं पर आधारित प्रतिमाओं का निर्माण होता चला आ रहा है
जलंधर गांव में विराजमान देवी की यह प्रतिमा बड़ी ही विलक्षण है प्रतिमा में माता पद्मासन में 7 ज्वालाओं पर विराजी है ज्वालाओं के अगल बगल में दो शेर बने हुए है माता की प्रतिमा की जिव्हा उनके उदर तक है
माता के उदर में भी एक मुख बना हुआ है
एक ही पत्थर पर निर्मित प्रतिमा में अन्य देवियां भी बनी हुई है जिन्हें क्रमश वैष्णवी ब्रह्माड़ी माहेष्वरी तथा भगवती है
प्रतिमा के ऊपरी भाग में विभिन्न देवो की आकृतियां है माता की प्रतिमा के शीश के ऊपर विश्राम मुद्रा में शिव अंकित है तथा इसके ऊपर अन्य देवता गण बने हुए है
चतुर्भुजी प्रतिमा के पीछे चक्र बना हुआ है 4 फ़ीट की इस प्रतिमा मैं माता के चरणों के पास कलश रखा हुआ है
इस प्रतिमा में वर्णित प्रसंग का उल्लेख रक्तबीज बध से है कहानी अनुसार रक्तबीज नामक भयानक दैत्य के आतंक से सारी सृष्टि पीड़ित हो गई रक्तबीज से देवता भी परास्त हो गए क्योंकि रक्तबीज को बरदान था कि उसके रक्त की बूंद जहां गिरेगी उससे एक नया दैत्य उत्पन्न होगा
तब देवताओं ने माता की स्तुति की ओर रक्तबीज संहार करने का निवेदन किया इस कार्य के लिए तीनो देवताओं ने अपनी शक्तियों से देवियाँ उतपन्न की ब्रहा से ब्राह्मणी शिव से माहेश्वरी विष्णु की शक्तियों से वैष्णवी प्रकट हुई जिन्होंने माता पार्वती के साथ असुरों का संहार प्रारंभ कर दिया
देवियों के इस युद्ध से रक्तबीज का बाल भी बांका नही हुआ क्योंकि जब उसका कोई अंग कटता ओर रक्त की बूंद जमीन पर गिरती तब नया दैत्य प्रकट हो जाता
ऐसी अवस्था में माता पार्वती ने अपने क्रोध स्वरूप को प्रकट किया जिसे कही काली ओर कही चंडिका कहा गया है
माता के इस रूप ने रक्तबीज का रक्तपान कर उसकी एक बूंद भूमि पर नही गिरने दी और उसका संहार हुआ
यहां पर इस प्रतिमा में माता के इसी कथानक के स्वरूप को दर्शाया गया है मुख्य प्रतिमा में माता की जिव्हा उनके उदर तक होने तथा उदर में दूसरे मुख द्वारा उन्होंने रक्तबीज के रक्त का पान कर उसका संहार कर सृष्टि को उसके आतंक से मुक्त किया है
प्रतिमा में माता के उदर में एक मुख होने पर इन्हें उदर मुखी भी कहा जाता है तथा सात ज्वालाओं पर विराजित होने पर इन्हें ज्वाला माँ के नाम से जाना जाता है इस स्थल को तांत्रिक शक्तिपीठ भी माना जाता है
ज्वाला माई की इस विलक्षण प्रतिमा के साथ यहां माता गौरी की प्राचीन प्रतिमा तथा भगवान गणेश की अद्वितीय प्रतिमा विराजी है
इन प्रतिमाओं के बारे में पुरात्तव तथा इतिहासविदों को कोई जानकारी नही है लेकिन भारत की प्राचीन इतिहास के अध्ययन से यह माना जा सकता है कि यह प्रतिमा 9 वी 10वी शताब्दी काल की हो सकती है
मंदिर में मिली गौरी प्रतिमा के स्वरूप अनुसार इसे परमार कालीन मूर्ति शिल्प माना जा सकता है इस के पीछे यह धारणा भी है कि समीपस्थ राहतगढ में परमार वंश का शासन रहने के शिलालेखीय प्रमाण मिलते है
वर्तमान में वर्ष की दोनों नवरात्रियों में प्राकृतिक वादियों में पहाड़ के ऊपर ही यहां मेले का आयोजन किया जाता है जिसमे दूर दूर से श्रद्धालु आते है
वर्तमान में ज्वाला माता का विशाल मंदिर निर्मित है ओर वर्तमान में इसका निर्माण एवं विस्तार क्रम चालू है मंदिर में नवनिर्मित मंदिर के व्यवस्थापक ने बताया कि पहले माता की यह प्रतिमाये घने जंगल में एक वृक्ष के नीचे विराजित थी जिनकी स्थापना इस नवीन मंदिर में की गई है यह प्राचीन ओर विलक्षण प्रतिमाये यहां कहाँ से आई यह रहस्य तथा खोज का विसय है
वैसे भी बुंन्देलखण्ड अंचल में लगभग प्रत्येक गांव में बेशकीमती पुरा सम्पदायें बिखरी पड़ी है जिनके संरक्षण के कोई विशेष प्रयास नही किये गए है
अकेले सागर जिले की ही बात की जाए तो ऐसे अनेक प्राचीन ऐतिहासिक स्थल है कि जिनका संरक्षण कर दिया जाए तो यहां पर्यटन केंद्र बन सकते है
वैसे ज्वाला माता के यहां आगमन को लेकर ग्रामीण अंचलों में अनेक किवदंतियां भी प्रचलित है लोग इस प्रतिमा का संबंध वर्तमान राहतगढ (प्राचीन नाम-पथरीगढ़) जिसका वर्णन जगनिक के लिखे आल्हखंड में है
बताया जाता है माता
पथरीगढ़ के राजा जवालसिंह की कुल देवी थी जो उनसे रुष्ठ होकर यहां आ गई थी वही दूसरी कहानी अनुसार जब आसपास मुगलों ने आक्रमण किया तब कुछ साधुओं ने इस प्रतिमा को जंगल मे लाकर छिपा दिया था
हालांकि कहानी कुछ भी हो लेकिन यह सत्य है कि माता की यह प्रतिमा पुराणों में वर्णित प्रसंग अनुसार दिव्य ओर आलौकिक है इस स्वरूप की दूसरी प्रतिमा संभवतः भारतवर्ष में इकलौती है
माता के इस दिव्य तथा पुरातात्विक महत्व के वैभवशाली स्वरूप के दर्शन आपको आध्यात्मिक शक्ति तथा मानसिक शांति प्रदान करेंगे इनके स्वरूप के प्रभाव को इनके दर्शनों के उपरांत ही जाना जा सकता है
तो बोलिये ज्वाला माई की जय
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